प्रकृति का वादा - तुम


प्रकृति के मूल सिद्धांतों में जुड़ाव निहित है, इसके वचनों से हर कोई भीगा हुआ है वह भी जिन्हें वादों से दूर रहना भाता है। ज़िन्दगी के लम्हों को गुज़ारते हुए एक दिन ऐसे ही प्रकृति का कोई नियम अपने चेहरे पर से पर्दा हटा सामने आ जाता है और फिर उसकी ख़ुमारी से निकलने का वक़्त ही नहीं रहता इंसान के पास। मैंने जब पहली बार तुम्हें देखा था तो मुझे महसूस हुआ कि कोई अनकहा वादा लौट आया है मुझ तक जिसे पूरा करना जीवन के निश्चित मकसदों में से एक है। तुम्हारे साथ ऐसा लगता है कि प्रकृति के साथ मेरा रिश्ता गूढ़ होता चला जा रहा है। प्रेम की परिभाषा के परे मैं महसूसना चाहता हूँ वे सारे क्षण जिनमें लिखी गईं हैं कुछ खामोशियाँ और अनगिनत एहसास। जीवन के जिस अंदाज़ से तुमने मेरा परिचय करवाया है उसे अकेले देख पाना संभव तो है किंतु सहज नहीं। वक़्त की डोर को थामे हुए अब लगने लगा है कि साधन नहीं साध्य महत्त्वपूर्ण है; मेरे जीवन के अघटित पहलुओं को तुम्हारे प्रेम से मायने मिलने की आस है और ख़ुशी भी। मुलाक़ातों के बोझ से दूर मैं चाहता हूँ कि हृदय के रास्ते हम एक-दूजे की खोज ख़बर रख पाएँ।

तुमसे मिल जाना इस तरह जीवन के पड़ाव में, वे रंग भर रहा है मेरी यात्रा में जिनका होना पूर्वलिखित था कहीं मेरे जीवन के पन्नों में। तुम्हारी रोशनी का दामन थामें, मेरे अँधेरे में बैठे ख़्वाब अब चहचहाना चाहते हैं। दबी हुई बातें और अनसुलझे एहसास तुमसे लिपटकर उस तरह व्यक्त हो जाना चाहते हैं जैसे फूल की ख़ुशबू। तुम्हारा आना मेरे सफ़र को अर्थ प्रदान करने लगा है, मन के मैले संताप अब प्रिय के एहसास की धार में धुलने लगे हैं। अकेलेपन और जानी हुई इस अजानी दुनिया के मेले में मुझे इंतज़ार है उन पलों का, जब दो जोड़ी आँखें और दो जोड़ी अधर अपने और परायेपन का अंतर समाप्त कर कुछ नए रिश्तों के बीज बोयेंगे।

- कमलेश

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