कोरा कागज़

देखा करता है ख्वाब हर कोई

मुकम्मल मुश्किल से कर पाता है

अपनी तकदीर लिखने के जुनून में

कोरा कागज फिर कोरा रह जाता है ।
 


हौसलो में ताकत हर किसी के नही है

खुद पर यकीन हर किसी को नही है

ठहर जाता है मुसाफ़िर राह में

अपनी मंजिल से भटक जाता है

अपने सपनो को पूराकरने चला वो

कोरा कागज फिर कोरा रह जाता है ।



चाहते है सब अपनी मर्जी का जहान्

वक्त को बदलने की लेकिन चाहत कहाँ

पलट देता है बाजी राह में

वो वक्त फिर हावी हो जाता है

अपने सपनो को पूरा करने चला वो

कोरा कागज फिर कोरा रह जाता है ।

 


                                 .....कमलेश.....

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