रिश्तों की ज़िन्दगी

Source - thriveglobal.com

ज़िन्दगी के रास्ते अगर उतने ही आसान होते जितने वह सुनने में लगते हैं तो शायद एक सूखे पत्ते की तरह बहकर इसे जिया जा सकता था; लेकिन ऐसा नहीं है. एक तरफ ज़िन्दगी के हर बीतते पल में अनगिनत ख़्वाब अपना आशियाँ ढूंढते हुए आँखों में अपना सिर छुपा लेते हैं वहीं दूसरी ओर हर वक़्त सुलझते-सँवरते रिश्ते हाथों की अँगुलियों में अपनी पकड़ मजबूत करते रहते हैं. ख़्वाबों के पीछे भागना सबको होता है लेकिन उतना जज़्बा इकठ्ठा करके चलने की ताकत खोजते खोजते उम्रें बीत जाती है. न जाने किस घड़ी पैदा हुए लोग ही सोचते हैं कि उनके रिश्ते सँवरने सुलझने से परे उनकी पहचान को समझ कर उन्हें अपनी आज़ादी और प्रेम को महसूसने न दें तो एक कदम आगे बढ़ जाने में कोई बुराई नहीं है. रिश्ते जन्मजात तो केवल गिनती के होते हैं बाकि का जोड़-घटाव तो इंसान ख़्वाबों के पीछे भागते हुए (ऐसा हर किसी को लगता है लेकिन लगने और होने में फ़र्क है) करता है अपने रिश्तों में. ज़िन्दगी अगर आज़ादी और अपनापन न परोसे तो उसे खोजकर चखने को जीने का फ़र्ज़ कहने में कुछ ग़लत नहीं है. रिश्तों की दिखती न दिखती दीवारें, अक्सर अपनेपन और आज़ादी को जी लेने में रूकावट जैसी दिखाई पड़ती है लेकिन होती नहीं; यह सच बहुत कम ही जान पाते हैं. खैर, रिश्ते ख़्वाबों तक पहुँचने की सीढ़ी होते हैं और अगर आपने सीढ़ी के पांयचे सही पकड़ लिए तो मंज़िल दूर नहीं लगती. कुछ रिश्ते वक़्त के साथ अपने होने को खोते और पाते रहते हैं, जब जब कोई रिश्ता उसमें रहने वालों को बाँधने लगता है तो वे आज़ाद पंछी उसे तोड़कर उड़ जाते हैं क्योंकि बंधन में कोई नहीं रहना चाहता. इस प्रक्रिया में ग़लत कोई नहीं होता बल्कि तीनों अपनी जगह सही होते हैं बस फ़र्क यह होता है कि तीनों एक दुसरे से काफी अलग होते हैं. ज़िन्दगी ख़ुद के अधूरेपन की चादर को घुटनों में सिमटाकर रोते रहने के लिए कतई नहीं बनाई गई है; यह तो बनी है कि ख़ुद के अधूरेपन को कुछ रिश्तों में घोलकर पूर्णता भरा सफ़र तय किया जा सके और सबकी चादरों को जोड़ एक ख़ूबसूरत आशियाँ तराशा जा सके, जिसमें सबके लिए अपनापन और आज़ादी मुकम्मल तौर पर हो. मैं खोज रहा हूँ अपने ख़्वाबों के दिए हुए सन्दर्भों से अपनी राहों को, अनगिनत रिश्तों से मेरा सबका हुआ और उनमें से मैंने कईयों को पीछे भी छोड़ा; लेकिन मुझे इस बात का अफ़सोस नहीं है कि रिश्ते अधूरे रह गये बल्कि मैं सुकूं में इसलिए हूँ कि मैंने ख़ुद के साथ अपनी मंज़िल के ख़ूबसूरत सफ़र में मिले हमराही को रिश्ते द्वारा बंध जाने से पहले आज़ाद होने दिया.

- कमलेश

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