उन दिनों की दीवारों से -


ज़िन्दगी बिना दीवारों का एक कमरा है. ताउम्र ख़्वाबों को खोजते खोजते यह महसूस होता है कि हर कोई बस बाँध लेना चाहता है लेकिन यह अधूरा सच है. पूरा सच है कि जितनी बार मुझे लगा कि मुझे बाँधा जा रहा था उतनी ही बार मैं अपनी आज़ादी को और क़रीब से देखकर उसके लिए अपना रास्ता तैयार कर रहा था. चलते चलते न जाने कब कुछ दीवारें मुझे इतनी भा गई कि मैं उन्हें महसूसने के लिए बार बार लौटता रहा. ऐसा नहीं था कि मुझे बंदिशें भाती थीं पर मैं उन दीवारों का शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होंने मुझे उस वक़्त में सुना जब मेरे क़रीब किसी के कान नहीं थे, उन्होंने मुझे उस वक़्त देखा जब मैं अकेले घुटनों में सिर देकर रोता रहा लेकिन वे नि:शब्द सी मेरे कन्धों पर हाथ रखे मुझे एहसास कराती रही कि वे मेरे साथ हैं चाहे फिर कुछ भी हो और एक दिन मैंने अपनी आज़ादी चुनी उनकी कीमत पर. शायद यही इंसान के ख़्वाबों की नियति होती है कि जिस अँधेरे ने उसे सब कुछ सिखाया होता है वह उसी की कीमत पर अपनी रौशनी हासिल करता है. 

             मैं दुनिया से दूर जब अँधेरी रातों में तारों की रौशनी के साथ अपनी ख़ामोशी और अकेलापन बाँट रहा था तब चाँद मुझे बुरा नहीं लगा, वह बस मेरी हकीक़त से परे था. मैं अपने जीवन की मुश्किल कहानियों को लिख कर उनका अस्तित्व मिटा रहा था और कुछ न लिखकर अपने वजूद को ज़िन्दा रखे जा रहा था. जब सब कुछ धुँधला गया तो मैंने अपने हाथ में थामे हुए धागों को छोड़ दिया ताकि वे मुझे वह दिखा सके जो मैं एक तरफ से झाँककर नहीं देख पा रहा था. ज़िन्दगी की ख़ूबसूरती राहों के उन छोटे छोटे पत्थरों में बसी हुई है जिन्हें मैं देखना नहीं चाह रहा था. ख़ुद में उतरने से पहले मैंने एक गहरी साँस ली ताकि मैं अगर ख़ुद में घुटन महसूस करने लगूं तो थोड़ी देर और ठहरकर निहार सकूँ अपनी हकीक़त. खैर, सबसे परे मैंने जब एक दिन आँखे खोली तो ख़ुद को उन दीवारों से बहुत दूर, नन्हे पत्थरों के बीच पाया. मुझे हैरानी नहीं हुई शायद मेरा अंतस इस बात का इंतज़ार कर रहा था. मैं उठा और तमाम अँधेरों से मिले ख़्वाबों को अपनी जेब से निकाल कर हवा में उड़ा दिया. मैं आज भी सोचता हूँ कि ‘गर उस दिन मैंने ख़ुद का हाथ न थामा होता तो प्रेम से भरी इन राहों में इस तरह बेतरतीबी और बेगानेपन से चलने के बावजूद ख़ुद को संभाल न पाया होता; लेकिन अब क्या फायदा उन सारी बातों को सोचने से, अब सब इतिहास है और मैं एक बार फिर अपनी दीवारों के पास लौट आया हूँ लेकिन इस बार आँसू नहीं आँखों में, एक चमक है जो मेरे अँधेरों से बातें करती है और हर रोज़ सोने से पहले मुझे याद दिलाती है कि सफ़र कितना बाकी है!
- कमलेश 


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