दिन, ज़िन्दगी और प्रेम

 


ज़िन्दगी को जीते हुए कभी कभी यह ख़याल आता है कि इस जीने के प्रक्रिया से यानि उन सारी चीज़ों, उन सारे कामों से जो हम ख़ुद को ज़िन्दा रखने के लिए करते चले आ रहे हैं उनसे एक ब्रेक मिलना चाहिए. ज़िन्दा रहने के चक्कर में हम कितनी चीज़ों को ऐसे ही छोड़ देते हैं अमूमन दिन के गुज़रने को ही ले लीजिये. मुझे ऐसा लगता है कि हम दिन को गुज़रते हुए कभी भी नहीं देख पाते. जैसे, वह पल जब नींद बिस्तर छोड़ती है और सवेरा आँखों में उतरता है. सूरज की पहली किरण एक परिपक्व प्रेमी की तरह चेहरे को छूती है और रात भर की थकान सुबह की ठंडी हवा के साथ कहीं गुम हो जाती है. और इस तरह जीवन जीने का जतन करते करते अनगिनत चीज़ें हमारे जीवन का हिस्सा हो जाती है जहाँ हम कभी नहीं पहुँच पाते. 


मेरी ज़िन्दगी में कुछ एक ऐसी चीज़ें हैं जिनसे मिलकर मैं ख़ुद के क़रीब होने जैसा कुछ महसूस कर पाता हूँ. दिन के पहले पानी के घूँट में मुझे वह प्रेमिका याद आती है जिसने मुझे मरते मरते बचाया था. नाश्ते के पहले कोर में मुझे वो अम्मा मिल जाती हैं जिन्होंने पिछले बरस मेरे खेतों में गेहूँ काटा था. नहाते हुए मैं ख़ुद को विदर्भ (महाराष्ट्र राज्य का एक क्षेत्र जोकि सूखाग्रस्त रहता है) की उन महिलाओं के बीच पाता हूँ जो अपने बगल में गागर लटकाए पानी खोज रही होती हैं. काम के लिए तैयार होते वक़्त मुझे कृष्ण और अर्जुन कुरुक्षेत्र से अपने ऑफिस में आते हुए नज़र आते हैं. खाना खाते हुए मुझे ऐसा लगता है जैसे 40 करोड़ लोग उम्मीद भरी निगाहों से मुझे देख रहे हैं. इन सब के बीच दिन कब ख़त्म हो जाता है पता ही नहीं चलता!


जब कभी मुझे अपनी ज़िन्दगी जीते हुए प्रेम का ख़याल आता है तो मैं उस लड़की को याद करने लगता हूँ जिसे मैंने पिछले महीने ही propose किया था. मुझे उस समय पता चलता है कि प्रेम जीना क्या होता है! मेरा प्रेम मेरी ज़िन्दगी का वह हिस्सा है जिसे मैंने अपने संग रह रहे हर उस शख्स़ में जिया है जिसके साथ में मैं प्रेम जैसा कुछ महसूस कर रहा होता हूँ. उस क्षण में मैं ख़ुद को उस इंसान में जी लेता हूँ और बाकि समय उसके प्रेम में होने का स्वांग जीता रहता हूँ. इतने सालों से अकेले रहते रहते मैं यह जान गया हूँ कि मैं कितना अधिक social हूँ! अकेलेपन का role-play करते करते ऐसा लगने लगा है जैसे मैं तमाम उम्र यह चाहता रहा हूँ कि जो कोई मुझ तक आये मुझे छुए बग़ैर ही लौट जाए तो बेहतर है.


अकेलेपन और प्रेम में जीते रहने के स्वांग में मैं उन तमाम लोगों को अपने इर्द-गिर्द बाँधे रखता हूँ जो मुझमें ख़ुद को महसूसने आते रहते हैं ताकि उनका ख़ुद का भी प्रेम स्वांग चरितार्थ हो सके. इतने सालों के नाटक से मुझे अब ऊब होने लगी है मैं चाहता हूँ कि इस script के ख़िलाफ़ जाकर ख़ुद जैसा कुछ जी लूँ. ज़िन्दगी में खाली पड़ी जगहों में ख़ुद को ठूस ठूस कर भर-रखने और किसी के साथ को प्रेम की तरह महसूसने में शायद दिन गुज़रने जैसी सामान्य घटना तक ज़िन्दगी से ग़ायब हो जाती है. ख़ुद के जैसा हो जाने के लिए मैं अपने होने में से वह सब कुछ बाहर फेंक रहा हूँ जो अब बेकार हो चूका है; जो मेरा नहीं है. मैं एक खाली जगह बना रहा हूँ ख़ुद में ख़ुद के अतिक्रमण को कम करते हुए ताकि ऐसा कोई शख्स़ जिसको मेरे क़रीब आकर प्रेम जैसा कुछ वाकई महसूस होने लगे वह उस खाली जगह को अपने होने भर से ख़ुशी ख़ुशी भर सके.

- कमलेश

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