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इंतज़ार और तुम -

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   Source - Nojoto  इंतज़ार के क्षण दुनिया में घटने वाले सबसे लंबे और गहरे क्षणों में गिने जा सकते हैं। जब सारा संसार अपनी गति में तल्लीन होकर बेतहाशा गन्तव्यहीन सा भागा जा रहा होता है; ठीक उसी समय कुछ जोड़ी आँखें, अनेकों कान, अनगिनत होंठो के जोड़े और कई-कई हाथ अपने अस्तित्व में कुछ और जोड़ लेने की चाहत लिए, ख़ुद को इंतज़ार की अनंत परिधि में धकेल दिया करते हैं। इंतज़ार का वजूद केवल उन्हीं क्षणों में सिमटकर नहीं रहता अपितु ये लम्हें किसी व्यक्ति या विशेष के समूचे वर्तमान में ख़ुद को विस्तृत कर देते हैं; जो उसके स्वयं के संचालित होने के क्रम को धीमा करने लगता है और घड़ी दर घड़ी उसे गहराई की अनेकों परतों में उतार ले जाता है। मैं दुनिया में घटने वाले तमाम क्षणों में से कुछ-एक को चुनकर, उसके दीदार के लिए मुंतज़िर हो जाना चाहता हूँ। मैं उस क्षण के इंतज़ार में अपने होने को स्थगित करना चाहता हूँ, जब वह इन भागते हुए लम्हों में अपने प्रेम से सरोबार आलिंगन से; चंद पलों के लिए ही सही; इन्हें थाम कर रख देगी। - कमलेश

इंतज़ार और तुम

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तुम देखती हो थोड़ी सी गर्दन झुकाकर मेरी ओर तो ऐसा लगता है कि सूरजमुखी देख रहा है सूरज को। सातों आसमान के पार से जब गूँजता है तुम्हारा स्वर तो इतनी ज्यादा ख़ुशी होती है कि मैं जून में भी नंगे पैर चल लेता हूँ। तुम मिली इस दफा मुझे पहाड़ों की गोद में, जहाँ मुझे कई जन्मों से आना था शायद: वहाँ आकर तो यही लगा था मुझे, तो घर वापसी जैसा भाव पैदा हो गया। तुम्हारे साथ प्रकृति को इतना सहज पाता हूँ जैसे कि किसी ने इसकी जंज़ीरें खोल दी हों, तुम खिल उठती हो जब पानी की चंद बूँदों से तो मेरा मन करता है कि उतार दूँ बादलों का तमाम पानी जो तुम तक पहुँच कर अपना जीवन सफल कर ले। जिस तरह दुनिया संजो रही है सारे सूत्र और समीकरण, मुझे ऐसा लगता है उसने तुम्हें पहचाना ही नहीं अब तक, कभी कभी जी करता है कि बिग बैंग थ्योरी वाले वैज्ञानिक को तुमसे मिलाऊँ, ताकि वो अपनी भूल सुधार सके। तुम्हारे साथ रहता हूँ तो अकेलेपन के सारे सिद्धांत मुझे खोखले लगते हैं, तुम जब डर जाती हो किसी जानवर से, उससे अपना प्रेम जाहिर करते हुए तो तुम्हें भँवरा बनकर छेड़ने को जी करता है।          ...

अनजानी सी तुम

यूँ ही घूमते हुए किसी पार्क में, जब देखता हूँ वहाँ खेल रहे बच्चों को, तो मेरा बचपन हिलोरें मारने लगता है मेरे भीतर। कुछ मुस्कुराहटें जो अनजान लोगों के चेहरे पर देखता हूँ, तो ...

कविता २ (इंतज़ार)

छाई है ख़ामोशी इस कमरे में जहाँ तुम छोड़ गए अपनी अनुपस्थिति, मैं कर रहा हूँ अभी भी वो सारी बातें जो हो रही थी उपस्थितियों के क्षणों में; ढूँढ रहा है बिस्तर पर गिरा हुआ एक आँसू कि ...

ज़िंदगी

मैंने देखा एकटक आसमान को, तो एक सितारा उतरकर मेरे साथ चलने लगा। रास्ते में मिल गई थी कुछ परछाईयाँ, ठहरा वहाँ तो वो रिश्ते बनकर साथ आ गईं। पलकों पर रहते थे कुछ जज़्बात हर पल, अब व...

काफी नहीं होगा

मेरे आसुंओं पर बड़ा देना यूँ रुमाल काफी नहीं होगा, हर बार की तरहा मेरे ग़म बाँट लेना काफी नहीं होगा। वक़्त बाँटने की कीमतें आसमान छूने लगी हैं अब तो, सिर्फ एक शाम के लिए यहाँ आना ...