जिंदगी की राहों से गुज़रते हुए अपने कुछ अनुभव साथ लिए चल रहा हूँ, यहाँ मेरे अन्तर्मन से उपजे प्रेम, समाज, जिंदगी, देश आदि के बारे में विचारों को आप पाएंगे ।
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मैं भविष्य को नकार दूँगा
जब कोई लिखेगा मुझे ख़त,
मेरा अतीत हर उस दरवाज़े पर
दस्तक देने के लिए आएगा;
जहाँ मैनें कभी ठहरकर
उसके वर्तमान के वर्तमान में,
अपना पता छुपा दिया था।
- कमलेश
Source - Financial Express हमारा देश इस वक़्त विकास के ऐसे दौर से गुज़र रहा है जिसमें हमें शहरों के साथ साथ गाँवो का विकास करने की भी बहुत ज्यादा आवश्यकता है । कुछ महात्वाकांक्षी लोगों की सोच काफी सही है कि अगर गाँव का विकास देश के विकास से जुड़ा है तो हमें गाँव का विकास राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की सपनों के तले करना चाहिए । वे कहते थे कि " मैं चाहता हूँ कि भारत के सारे गाँव खुद के प्रयासों से इतने आत्मनिर्भर हो जाएं कि उन्हें अपनी किसी भी ज़रुरत के लिए किसी और पर निर्भर नहीं रहना पड़े।" उक्त कथन से स्पष्ट है कि गाँधी जी गांवो को सम्पूर्ण विकास के बावजूद भी गाँव ही रहने देना चाहते थे। गाँव हमारे देश का प्रतिबिम्ब हैं जो प्रकृति के दर्पण में अपनी खूबसूरती लिए झलकता है या यूँ कहे कि इस देश का आँगन है गाँव। आँगन की परिभाषा है घर के सामने क...
हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां हर कोई अपने जीवन में किसी न किसी चीज का पीछा कर रहा है। एक स्थान से दुसरे की ओर बढ़ने की इस यात्रा में हम अपनी भावनाओं , जरूरतों , लालच , आकांक्षाओं और अन्य कई चीजों के साथ काम करते हैं , जिसके परिणाम में हम आनंद , खुशी , तनाव , दुःख , दबाव , क्रोध , शांति , दोष , कृतज्ञता जैसी कई सारी भावनाओं को महसूस करते हैं। मैं कुछ साल पहले स्वामी विवेकानंद को पढ़ रहा था , उन्होंने अपने एक भाषण में कहीं उल्लेख किया था कि दोषारोपण का खेल खेलने के बजाय हम एक बार ठहर कर यह देख सकते हैं कि हमारे भीतर से निकलने वाली हर चीज का स्रोत क्या है! यह विचार मुझे बहुत ताकत देता रहा जब मैं अपनी सीमाओं को पार कर रहा था और लोगों की कहानियों के साथ अपने व्यक्तिगत विकास के लिए एक रास्ता खोज रहा था। दो साल पहले एक आवासीय कार्यक्रम के दौरान , मुझे आभार व्यक्त करने की ताकत का एहसास हुआ कि यह उस दुनिया में जादू कैसे पैदा कर सकता है जिससे हम जीना चाह रहे हैं! ...
Source - Pinterest.pt ये आँखें तुम्हारी शराब है क्या, नाज़ुक होंठ कोई गुलाब है क्या । महकती है खुश्बू हर-तरफ तेरी, जिस्म ये तुम्हारा गुलशन है क्या । रातों से तकरार-चांद से मौसिक़ी, तुझसे इश्क़ कोई मज़ाक है क्या । छू लें तुम्हें जो कभी बेशर्मी से हम, तो बतलाओ कोई ऐतराज़ है क्या । ऐसे वक़्त ज़ाया नहीं किया करते, हसीन शामें हर रोज़ आती है क्या । मेरे सवालों पर ऐसे ख़ामोश बैठ गए, किसी बात की तुम्हें नाराज़गी है क्या । ये ज़माना सताता ही है चाहने वालों को, पर खुद सोचो इसकी औकात ही है क्या । माना कि एक दिन सबको मरना है, तो बतलाओ हम जीना छोड़ दें क्या । कुछ दिनों से ख़फा हैं चंद मिलने वाले, सोचता हूँ ये लोग कहीं के नवाब है क्या । मौत आए तो उसे कहना इंतज़ार करे, तेरे दीदार के बगैर ही मर जाएंगे क्या । ...
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