संदेश

Consent & We - The Emotional Beings

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Source - sayfty.com Have you ever thought about asking to seek permission in this permissionless world? Any type of connection begins with the desired need of establishing it, knowingly or unknowingly. Whenever someone asks me for consent it unconditionally opens my heart to welcome the fact that the person in front of me is willing to respect my needs. And, whenever I feel my needs are being given their due, my heart connects the dots to bridge all the gaps which can occur to build a strong connection with the individual irrespective of her portrayal of self. I also think a lot about the condition when people do not ask for consent and directly attack my personal space; which every time results in disrupting my connection with them in that particular moment. I do not know how does it work for other people yet I believe the feeling would be the same if someone enters into someone's personal space without caring about the need of the person in question. It was only a few years ag...

सहमति और हम - भावनात्मक जीव

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  Source - sayfty.com क्या आपने कभी बिना अनुमति की इस दुनिया में अनुमति लेने के बारे में सोचा है? किसी भी प्रकार का संबंध जाने या अनजाने में इसे स्थापित करने की वांछित आवश्यकता से शुरू होता है। जब भी कोई मुझसे सहमति मांगता है तो इस बात का स्वागत करने के लिए बिना शर्त मेरा दिल खुल जाता है कि मेरे सामने वाला व्यक्ति मेरी जरूरतों का सम्मान करने को तैयार है। जब भी मुझे लगता है कि मेरी जरूरतों को उनका वांछित सम्मान दिया जा रहा है, तो मेरा दिल उन सभी अंतरालों को पाटने के लिए हर एक बिंदु को जोड़ लेता है जो किसी भी व्यक्ति के साथ एक मजबूत संबंध बनाने के लिए सामने आ सकते हैं, भले ही वह अपने आप को किसी भी तरह देखे! मैं उस स्थिति के बारे में भी बहुत सोचता हूं जब लोग सहमति नहीं मांगते हैं और सीधे मेरे व्यक्तिगत परिवेश में हमला कर देते हैं; जो हर बार उस पल में उनके साथ मेरे संबंध को नकारात्मक तौर पर ही प्रभावित करता है। मुझे नहीं पता कि यह अन्य लोगों के लिए किस तरह काम करता है, फिर भी मेरा मानना ​​​​है कि अगर कोई भी व्यक्ति किसी की ज़रूरत की परवाह किए बिना किसी के व्यक्तिगत परिवेश में प्रवेश कर...

प्रकृति का वादा - तुम

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प्रकृति के मूल सिद्धांतों में जुड़ाव निहित है, इसके वचनों से हर कोई भीगा हुआ है वह भी जिन्हें वादों से दूर रहना भाता है। ज़िन्दगी के लम्हों को गुज़ारते हुए एक दिन ऐसे ही प्रकृति का कोई नियम अपने चेहरे पर से पर्दा हटा सामने आ जाता है और फिर उसकी ख़ुमारी से निकलने का वक़्त ही नहीं रहता इंसान के पास। मैंने जब पहली बार तुम्हें देखा था तो मुझे महसूस हुआ कि कोई अनकहा वादा लौट आया है मुझ तक जिसे पूरा करना जीवन के निश्चित मकसदों में से एक है। तुम्हारे साथ ऐसा लगता है कि प्रकृति के साथ मेरा रिश्ता गूढ़ होता चला जा रहा है। प्रेम की परिभाषा के परे मैं महसूसना चाहता हूँ वे सारे क्षण जिनमें लिखी गईं हैं कुछ खामोशियाँ और अनगिनत एहसास। जीवन के जिस अंदाज़ से तुमने मेरा परिचय करवाया है उसे अकेले देख पाना संभव तो है किंतु सहज नहीं। वक़्त की डोर को थामे हुए अब लगने लगा है कि साधन नहीं साध्य महत्त्वपूर्ण है; मेरे जीवन के अघटित पहलुओं को तुम्हारे प्रेम से मायने मिलने की आस है और ख़ुशी भी। मुलाक़ातों के बोझ से दूर मैं चाहता हूँ कि हृदय के रास्ते हम एक-दूजे की खोज ख़बर रख पाएँ। तुमसे मिल जाना इस तरह जीवन के...

सवाल किस बात का है?

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सैंकड़ों जलती चिताएँ अनगिनत भटकते लोग, पैदल घर लौटती एक दुनिया प्यास-भूख से थमती साँसे, आँसुओं की अविरल धारा छोड़ गए साथियों का ग़म। कितना कुछ है यहाँ जिसे देखने के लिए आँखें नहीं करुणा की ज़रूरत है। वे पूछते हैं तुम किस पाली में हो? मैं ख़ुद से करता हूँ सवाल कि क्या अब भी देखा जाए एक ख़्वाब जिसमें धर्म की लकीरें न हों पैसों से पनपती खाई न हो घर लौटने वालो के लिए आराम हो अकेली लड़की के मन में खौफ़ न हो स्त्री के सिर पर तमाम बोझ न रखा हो बच्चों के खेलने का खुला मैदान हो मान-सम्मान के परे लोग मिलते हों बचपन से लाई गई हंसी हो युवाओं की ज़ुबाँ पर सवाल हो हुक्मरानों की नीति नहीं नियत साफ़ हो बगल में आग लगने पर  अपने घर में चादर ओढ़कर सोने वाले न हों! मैं चाहता हूँ कि  यह न पूछा जाए कि कौन किस पाली में बैठा है बल्कि सवाल चाहत का रहे; जैसे एक प्रेमी-युगल चाहे साथ बैठकर बातें करना ढलते सूरज को सुकूँ से देखना एक-दूजे के होंठो का चुम्बन भीड़ के डर से परे एक आलिंगन जिहाद से परे चाँदनी की एक सैर पहचान से बहुत दूर पनपती प्रेम और सिर्फ प्रेम की एक दुनिया।           ...

अँधेरे से उपजता उजाला -

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  Source - ephotozine.com कभी ऐसा हुआ है कि आप अपनी ही धुन में चले जा रहे हैं और किसी ने आपको धक्का देकर झकझोर दिया हो? क्या कभी इस बात की तरफ ध्यान गया है कि जो उजाला आपकी आँखें इस दुनिया में देख रही हैं वह किन अँधेरे गलियारों से होकर आ रहा है? या यह महसूस करने का यत्न किया है कि जीवन में पल रही तमाम वेदनाएँ और नफ़रत एक मार्मिक चुम्बन के आगे कोई अस्तित्व नहीं रखती! मैंने अपने रास्तों के अनगिनत क्षणों में ख़ुद को ऐसी अवस्था में पाया है जहाँ से मैं सिर्फ अपना सुख और उसके इर्दगिर्द फैला अँधेरा ही देख पाता हूँ. यह सुख असीम स्वार्थ और उतनी ही वासनाओं में लिपटा होता है और पल-पल इसमें वृद्धि ही होती है; इसके विपरीत उजियारे के उस ओर पल रहे अँधेरी वादियों का जुगनू मुझे हर बार उसी गर्त में झटकने में मशगूल रहता है जहाँ से सिवाय पीड़ा के कुछ हासिल नहीं होता. तमाम उम्र आदर्शों के मुखौटे पहने रहते हुए ऐसा समय भी आया है कि मैंने अपने ही कई हिस्सों का अस्तित्व सिरे से नकार दिया है. घट चुके या घट रहे क्षणों को लिखना आसान तो नहीं है लेकिन उतना दुर्गम और अयोग्य भी तो नहीं!  जितनी बार मुझे जीवन में...

वर्तमान का ख़्वाब -

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हम सारी ज़िन्दगी उस ख़्वाब के लिए अपनी नींदे ख़राब कर देते हैं जो हमने अब तक की सबसे गहरी और ख़ूबसूरत नींद में देखा था। नींद जागने से उतनी भी अलग नहीं होती जितना इसे बना दिया गया है: बल्कि नींद में आप अपने जीवन के उस हिस्से को नए सिरे से जीने लगते हो जिसको आप जागते हुए जीने की हिम्मत करने से बहुत डरते हो। इन सारी चीजों से जुड़े रास्ते बहुत बिखरे हुए से लगते हैं मुझको। एक दिन ऐसा आएगा जब यह बिखरते बिखरते उलझने लगेंगे और फिर हममें से किसी को भी अपनी मंज़िल कभी भी नहीं मिल पाएगी; और तब मैं किसी पेड़ के नीचे एक किताब हाथ में लिए मुस्कुरा रहा होऊँगा। उस दिन मैं अपने द्वारा जिये गए तमाम लम्हों को समेटकर उनकी गठरी को उस नदी में जाकर फेंक आऊँगा जिस नदी में पैर डुबोना मुझे सबसे ज्यादा सुकून देता है। इस उम्मीद को अपने होने के किसी कोने में छुपाये कि शायद ऐसा करने से मैं अपना अतीत मिटा सकता हूँ जिसमें वे बिखरे-उलझे रास्ते भी मिट सकें। और तब मेरे पास शेष रह जायेगा निरा वर्तमान; जो मेरा अपना है। इस वर्तमान को मैं उस लड़की के हाथों में हाथ रखकर जीना चाहता हूँ जिसे पिछले कुछ दिनों से मेरे फ़ोन कॉल का इंतज़ार र...

इंतज़ार और तुम -

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   Source - Nojoto  इंतज़ार के क्षण दुनिया में घटने वाले सबसे लंबे और गहरे क्षणों में गिने जा सकते हैं। जब सारा संसार अपनी गति में तल्लीन होकर बेतहाशा गन्तव्यहीन सा भागा जा रहा होता है; ठीक उसी समय कुछ जोड़ी आँखें, अनेकों कान, अनगिनत होंठो के जोड़े और कई-कई हाथ अपने अस्तित्व में कुछ और जोड़ लेने की चाहत लिए, ख़ुद को इंतज़ार की अनंत परिधि में धकेल दिया करते हैं। इंतज़ार का वजूद केवल उन्हीं क्षणों में सिमटकर नहीं रहता अपितु ये लम्हें किसी व्यक्ति या विशेष के समूचे वर्तमान में ख़ुद को विस्तृत कर देते हैं; जो उसके स्वयं के संचालित होने के क्रम को धीमा करने लगता है और घड़ी दर घड़ी उसे गहराई की अनेकों परतों में उतार ले जाता है। मैं दुनिया में घटने वाले तमाम क्षणों में से कुछ-एक को चुनकर, उसके दीदार के लिए मुंतज़िर हो जाना चाहता हूँ। मैं उस क्षण के इंतज़ार में अपने होने को स्थगित करना चाहता हूँ, जब वह इन भागते हुए लम्हों में अपने प्रेम से सरोबार आलिंगन से; चंद पलों के लिए ही सही; इन्हें थाम कर रख देगी। - कमलेश

साड्डा हक़, देश और ज़रूरतें -

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मैं नहीं जानता कि रॉकस्टार फ़िल्म में लिखा गया "साड्डा हक़" गीत इरशाद भाई के कितने क़रीब है या इससे जुड़े हुए लोगों के भी! मैंने अपनी ज़िंदगी के 14वें साल में यह फ़िल्म देखी थी, जिसे पूरी तरह समझ पाने में मैं अब तक असफल ही रहा हूँ लेकिन मैं ख़ुश हूँ कि उसके बाद के 9 सालों में इस गीत को बहुत क़रीब से जान, सुन और समझ पाया हूँ।  ज़िन्दगी और देश की वर्तमान अवस्था इतने ज्यादा आपस में जुड़े हुए हैं कि दोनों को स्वतंत्र रूप से देखना असम्भव तो है ही यह एक भूल भी है। इरशाद जी का लिखा यह गीत हर उस व्यक्ति की पैरवी करता है जो उसके स्वाभिमान और स्वातंत्र्य की लड़ाई में उसके हक़ों की बात करता है। हज़ारों लोग इससे असहमत हो सकते हैं और हों, अच्छा है आप तर्क कीजिये, अनुभव में डुबकी लगाइये और फिर समझिये कि यह क्या चीज़ है; ठीक वैसे ही कि इश्क़ कीजे फिर समझिये ज़िन्दगी क्या चीज़ है!  आज के वक़्त में अपने हक़ के लिए लड़ते किसान, बेरोजगार युवा, अल्पसंख्यक समुदाय, जागरूक-संगठन सबके लिए, अपनी पहचान की लड़ाई ही सबसे बड़ी है क्योंकि सरकार ने तमाम साधनों से इन्हें गुमनाम करने की साज़िश की है। इस गीत में एक पंक्ति है कि ...

प्रेम, ज़िन्दगी, मिथ्या और तुम -

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जीवन का हर पल एक अवसर माना जाता है. प्रेम को हर कदम के लिए अहम माना जाता है. मिथ्याओं से पार पाना असंभव माना जाता है. लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मानने, समझने और जान-लेने में फर्क किसी को समझ नहीं आता है. लोग व्यंग भरी बातों से इस कठिन समय को हल्का करने में लगे हैं और सोचा करते हैं कि कब यह कोरोना नामक दानव इस धरा से अपना पिंड छुड़ाये, हाँ बिल्कुल सही पढ़ा; कोरोना को हमसे पिंड छुड़ाना पड़ेगा हम तो कतई न मानने वाले. अब तुम ख़ुद ही देख लो, इतनी सख्ती और गाइडलाइन के बावजूद हम पहुँच जाते हैं यह जताने कि हम कितना चाहते हैं तुम्हें और जताने के लिए भी कितने आतुर हैं उस प्रेम को तुमसे!  शीर्षक पढ़कर यह भ्रम भी पाला जा सकता है कि मैं कोई भावपूर्ण प्रेम अनुभव या कहानी लिख बैठा होऊँगा, लेकिन मेरे किसान पिता को हाल ही में लाये गये तथाकथित किसान-बिलों से संतुष्टि हो पाए तब न! मेरे दोस्त ने जिस लड़की से प्रेम किया वह अपना सर-नेम कुछ और लिखती है; वे दोनों बग़ैर किसी मुश्किल के जी पाए तब न! हर रोज़ 110 से ज्यादा बलात्कार के केस या ख़बरे पढ़ने के बावजूद मेरा दिल समझ पाए कि मेरी महिला दोस्त या बच्चियां इस देश मे...

मैं और मेरा प्रेम

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 दुनिया में अनगिनत सवालों और परेशानियों के बीच मैं समझ पाया केवल दो बातों को. पहली कि ज़िन्दगी और विश्वास एक न दिखाई देने वाले अटूट धागे में जुड़े हुए हैं जो मेरे अंतस से पनप कर दुनिया में आता है; मैं चाहे कितना भी बाहरी जोर लगाऊं उसे महसूसा नहीं जा सकता बल्कि उसे मैं अपनी अंतस की खोज की यात्रा में सलीके से चख पाता हूँ. दूसरी यह कि प्रेम जीवन के तत्वों का सार है. मेरा पता लिए आस्था, भक्ति, जप, तप की अनगिनत कहानियाँ और प्रतिमाएँ आई किन्तु मैं सिर्फ प्रेम में ख़ुद से मिल पाया. यह कोई एहसास या रिश्ता नहीं है अपितु यह मेरे जीवन का वह हिस्सा है जो मैंने ख़ूबसूरती और ख़ुशी के क्षणों में सहेजकर बाकि जीवन में अनवरत जिया है. यह सर्वथा सरल, सहज और आंतरिक रहा मेरी राहों में; जीवन की राहों में अपना बाँकपन और आज़ादी समेटे प्रेम मुझे हर नए पल एक नए सूर्योदय का एहसास देता रहा. प्रेम सदैव सुलभता और स्वातंत्र्य का सम्मिश्रण रहा जो झोली में रिश्तों और समर्पण की सौगात भरे. विनोबा के सिद्धांतों में लिपटा "मैं" का विलय और केवल "होने" का एहसास जो प्रेम भलिभांति जीता है; जीवन के तमाम अहंकारों क...

प्रेम और प्रेम

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Source - psychologicallyastrology.com तुमने मुस्कुराते हुए मेरे जीवन के बगीचे में कदम रखा और उस क्षण से आज तक हर लम्हें में ख़ूबसूरती भरते रहने में मगन रही तुम। मेरे द्वारा लिए गए श्वास में तुम्हारे होने का पुख़्ता सबूत है या यूँ कहूँ कि ज़िन्दगी के कर्ज़ को उतारने में तुम्हारी उधारी बहुत है। इतने वर्षों के इस रिश्ते ने अनगिनत मोड़ और पड़ाव देखे किन्तु अपनी नियति से यह अनभिज्ञ ही रहा। आज जब अपने प्रेम के ज्वार के क्षणों में तुम्हें खोजता हूँ तो हर सुधि पर तुम्हारी छवि दिखाई पड़ती है। कुछ रिश्ते आज़ाद करते हैं ज़िन्दगी के बेगानेपन को, यह सच है लेकिन कैसे! यह अब तक अनुत्तरित है। तुम्हारे द्वारा सुनाई गई एक ख़बर मुझे प्रेम और प्रेम में फ़र्क समझाएगी यह नहीं सोचा था। चेहरे पर मुस्कान, आँखों मे अविरल नीर और हृदय में अपार उन्माद लिए निहारता रहा तुम्हारी तस्वीर, किन्तु समझ नहीं पाया अब तक कि ऐसा क्या है जो मेरे अन्तस से उमड़ पड़ा है तुम्हारी ज़िन्दगी की नई राहों की आहट पाकर! मैं तमाम असमंजस से परे यह समझने में क़ामयाब रहा हूँ कि प्रेम की उम्र और सीमा तय नहीं किये जा सकते; यह तब भी वही था और आज भी वही और वही...

केलि और कल

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Source - fr123rf.com ज़िन्दगी के पन्ने कितने ख़ाली हैं यह उनके भरते चले जाने के दौरान महसूस होता है. अपने अस्तित्व में से कुछ खो देने ग़म मुझे इस क्षण में महसूस होता है जब मैं कुछ भी नहीं दे पाने की स्थिति में होता हूँ. कल, यह एक सुरक्षित ख़्वाब है और एक याद भी जिसे अपनी सहजता के अनुसार जीवन में लाया जा सकता है. मेरा कल उन सारे ख़यालों का पुलिंदा है जिन्हें मैं ज़िन्दगी जीने के स्वांग में कहीं छोड़ बैठा हूँ; वे तमाम पल जिनको मैं अपने तईं नहीं जी सका. और इस विचार को देखकर यह लगता है जैसे मैं व्यर्थ ही जीए जा रहा हूँ. कल सजाने के फेर में जब हर दिन छोटी छोटी गलतियाँ करता जाता हूँ तो मुझे सपने में आने वाला कल एक बहुत बड़ी गलती के रूप में नज़र आता है. दुनिया ने इंसान का जीना आसान करने के लिए अनगिनत उपाय किये और किये जा रही है किन्तु मैं यह जानना चाहता हूँ कि ज़िन्दगी जीने की प्रक्रिया को आसान या मुश्किल करने का क्या अर्थ है!  कभी कभी मैं सोचता हूँ कि आदम और हव्वा ने अपने अप्रतिम और अतरंग क्षणों में कल का आविष्कार किया होगा और चाह रखी होगी कि कल भी उनकी केलि-क्रिया के समान सहज, सुन्दर और सजग बना र...

दिन, ज़िन्दगी और प्रेम

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  ज़िन्दगी को जीते हुए कभी कभी यह ख़याल आता है कि इस जीने के प्रक्रिया से यानि उन सारी चीज़ों, उन सारे कामों से जो हम ख़ुद को ज़िन्दा रखने के लिए करते चले आ रहे हैं उनसे एक ब्रेक मिलना चाहिए. ज़िन्दा रहने के चक्कर में हम कितनी चीज़ों को ऐसे ही छोड़ देते हैं अमूमन दिन के गुज़रने को ही ले लीजिये. मुझे ऐसा लगता है कि हम दिन को गुज़रते हुए कभी भी नहीं देख पाते. जैसे, वह पल जब नींद बिस्तर छोड़ती है और सवेरा आँखों में उतरता है. सूरज की पहली किरण एक परिपक्व प्रेमी की तरह चेहरे को छूती है और रात भर की थकान सुबह की ठंडी हवा के साथ कहीं गुम हो जाती है. और इस तरह जीवन जीने का जतन करते करते अनगिनत चीज़ें हमारे जीवन का हिस्सा हो जाती है जहाँ हम कभी नहीं पहुँच पाते.  मेरी ज़िन्दगी में कुछ एक ऐसी चीज़ें हैं जिनसे मिलकर मैं ख़ुद के क़रीब होने जैसा कुछ महसूस कर पाता हूँ. दिन के पहले पानी के घूँट में मुझे वह प्रेमिका याद आती है जिसने मुझे मरते मरते बचाया था. नाश्ते के पहले कोर में मुझे वो अम्मा मिल जाती हैं जिन्होंने पिछले बरस मेरे खेतों में गेहूँ काटा था. नहाते हुए मैं ख़ुद को विदर्भ (महाराष्ट्र राज्य का एक क्...

मेरा मन

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Source - Himachaldastak.com बरामदे का न होना कितना खलता है! यह बात एक ऐसे घर में रहकर जान पाया जहाँ बरामदा नहीं था. मेरा मन भी बरामदा तलाशता है जहाँ बिखरा जा सके, टहला जा सके और गीली हो चुकी बातों को सुखाया जा सके. बरामदे में होकर ख़ुद को टटोलना, इस कृत्य के लिए मेरे मन में अक्सर जगह कम पड़ जाती है; इतना कुछ है बाहर का जो सारी जगह हथिया लेता है लोगों के ख़याल, बातें, यादें, लोग और अंत में ख़ुद के लिए ख़ुद में कुछ नहीं बचता. ख़ुद को छोड़कर सब कुछ है मेरे मन में जिसे बाहर निकालते हुए मुझे एक असह्य दर्द उठता है जिससे डरकर में ख़ुद के पास जाने से रुक जाता हूँ. दुनिया जितने चक्कर लगाती है उसमें एक चक्कर मन का भी हो ऐसा मेरा मन चाहता है ताकि पूरे मन का कोना कोना घूमा जा सके और अन्दर पल रहा ताप दूर करने का जो भी जतन हो किया जा सके. मन का ताप हरने के फेर में दुनिया को बुद्ध, महावीर, राम, कृष्ण, ईसा, पैगम्बर और न जाने कितने ही रत्न मिले लेकिन मेरा मन उसे हरना नहीं चाहता यह तो बस उसे समझना चाहता है.      कमरे की खिड़की के उस पार एक लम्बी छत है जहाँ से अक्सर एक लड़की अपने आपको लगाये गये पंखो ...

पल में छुपा पल

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Source - sidefx.com “वह बरामदे से उठी और पास के एक अँधेरे कमरे की ओर बड़ी, कमरे के दरवाज़े पर लगी कंदील मानो उसका इंतज़ार ही कर रही थी; जैसे ही उसने कंदील को छुआ वह तुरंत उसके हाथों में आ गई. कंदील उठाये वह उस अँधेरे कमरे में कुछ देर के लिए घूमती रही और अंत में किताबों की एक पूरानी कतार में से विनोद कुमार शुक्ल की एक किताब को अपने हाथों में लिए बाहर आ गई. यह घर उसके जेहन में तब से है जब से उसने दुनिया को समझना शुरु किया था. अक्सर जब वह इससे दूर होती है यह घर उसके सपनों में आया करता है और अपनी कहानी बताते हुए उसे अपने पास आने के लिए कहता है. आज जब इतने सालों बाद वह इस घर में वापस आई है तो उसके सपनों से जर्जर हालत इस घर की हो चुकी है, उसकी यादें आज भी घर को अपने अन्दर सहेजे हुए है और शायद यही वजह रही है कि घर उसके लिए अभी तक जर्जर नहीं हुआ है. बरामदे के सामने बनी बाड़े की दीवार ज्यादा बारिश की वजह से पिछले साल गिर गई थी लेकिन आँगन से जुड़े दो कमरे अभी तक सहज और सुरक्षित थे; एक में कुछ पूरानी किताबों का ज़खीरा था और दूसरे वाले कमरे में रहने भर की जगह कुछ ज़रूरी सुविधाओं के साथ. विनोद कुमार शुक्ल...

कर्नाटक एक्सप्रेस -

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Source - theswaddle.com कई बार किसी से मिलकर ऐसा लगता है कि उससे पहले कहीं मिला जा चूका है लेकिन उसकी याद ताज़ा नहीं हो पाती. ज़िन्दगी ऐसे अनगिनत चेहरे भेजती है जिन्हें हम भूलचूक में पहचानने की कोशिशें करते हैं लेकिन सब कुछ व्यर्थ ही होता है. ऐसे ही किसी एक दिन मैं उससे मिला था उसका नाम तो मुझे याद नहीं उसकी प्रेमिका का नाम मुझे याद रह गया. ऐसा माना जाता है कि हम इंसानों को जानकारी और नामों से ज्यादा कहानियाँ याद रहती है और मेरे साथ भी यही हुआ था. मन्दाकिनी, कितना प्यारा नाम है! ऐसा लगता है कोई उत्तराखंड के पहाड़ों पर बैठा पुकार रहा है. यही नाम था उस लड़की का, जिस लड़के की वह प्रेमिका थी. मैं उससे एक रात कर्नाटक एक्सप्रेस में सफ़र करते हुए मिला था. वह लड़का किताबों का शौकीन है और उसे इस बात का नशा है कि ज़िन्दगी एक हसीं ख़्वाब है जिसे देखने के लिए छककर सोया जाना ज़रूरी है और उठकर ख़्वाब की हक़ीकत के लिए मेहनत करना भी. मैं नहीं जानता कि वो कहाँ जाना चाहता है अपनी ज़िन्दगी में लेकिन उसने बताया था कि कुछ सालों के बाद उसे अपनी प्रेमिका से शादी करनी है. जब मैंने यह सुना था तब मैंने उसकी हिम्मत की दाद दी...

बहुत दिनों के बाद

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                     "उसकी नींद दरवाजे पर किसी की दस्तक की वजह से टूटी, उसने बिस्तर से ही पूछा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. उसने उठकर दरवाजा खोला और पाया कि बाहर कोई नहीं था. कितनी ही बार दिल में ख़यालों की दस्तक से हम जाग पड़ते हैं इस उम्मीद में कि कोई ख़्वाब हक़ीकत बनकर दरवाजे आ गया है. दरवाजे और दिल की दस्तक में कितना अंतर है यह सुनने पर ही जाना जा सकता है. कुछ देर अँधेरे में भटकने के बाद उसने कमरे की बत्ती जलाई और हाल ही में आई एक किताब को पढ़ने बैठ गया. बड़े दिनों बाद उसने सुबह उठकर किताब को हाथ में लिया था, कुछ देर में ही वह किताब में घुल गया. अचानक हुए शोर से उसका ध्यान टुटा जो सामने वाली गली से आ रहा था उसने सोचा कि रोज़ की तरह लोग पानी भरने के लिए झगड़ रहे होंगे और बालकनी तक जा लौट आया. लौटकर आने पर उसे लगा की कमरे में कुछ बदल गया है जो उसके जाने से पहले वहाँ नहीं था. अक्सर ऐसा होता है कि कुछ कैद करने के जुनूं में कुछ महसूस करना छुट जाता है और इसके साथ भी यही हुआ. जिस कमरे में वह इतने दिनों से रह रहा था उसकी सोहबत को ही महसूसना भूल गय...

प्रेम-पीयूष

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Source - flickr.com मैं खोजता फिर रहा था बीते कुछ महीनों से अपने क्लांत मन के व्यग्रभावों में शांति, जो मुझे कई सालों से भी लम्बे प्रतीत हुए. अपनी तमाम बारीकियों और निर्लज्जता के साथ संसार करता रहा अनवरत ढंग से मेरे धैर्य और सीमाओं की परीक्षा: जिसका परिमाण मैं नहीं जानता. इन दुविधाओं के बीच से गुजरती राहों में एक दिन जब तुम्हारे समीप से गुजरी बयार मुझ तक आयीं तो अंतस ने एक ठहराव जान ख़ुद को रोक लेने का निर्णय लिया; वह सही है या नहीं इसे सोचने के लिए अब वक़्त नहीं. जीवन के चिर-सन्नाटे के स्पंदन में सुनी मैंने आँखों में गूँजती आहटें और देख पाया तुम्हारे नयन कलशों में भरे असंख्य प्रश्न जो मेरे अपने थे. तुम्हारे साथ मैं मौन में भी एक अविरल संवाद पा जाता हूँ और हर बार यह जान कर हतप्रभ रह जाता हूँ कि कितना कुछ छुपा है तुम्हारे अस्तित्व के उपवन में! तुम्हारे संग मैंने खोजी अपने अस्तित्व की नई शाखाएँ. तुम्हारे लहराकर उलझते केशों ने सुलझाई मेरी अनगिनत पहेलियाँ और एक धुरी पर घूमते मेरे अकिंचन सपनों को मिला तुम्हारे अधरों से प्रेम-पीयूष. विशिष्ट सी महसूस होती कुछ संकोच की दीवारों का...

उन दिनों की दीवारों से -

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ज़िन्दगी बिना दीवारों का एक कमरा है. ताउम्र ख़्वाबों को खोजते खोजते यह महसूस होता है कि हर कोई बस बाँध लेना चाहता है लेकिन यह अधूरा सच है. पूरा सच है कि जितनी बार मुझे लगा कि मुझे बाँधा जा रहा था उतनी ही बार मैं अपनी आज़ादी को और क़रीब से देखकर उसके लिए अपना रास्ता तैयार कर रहा था. चलते चलते न जाने कब कुछ दीवारें मुझे इतनी भा गई कि मैं उन्हें महसूसने के लिए बार बार लौटता रहा. ऐसा नहीं था कि मुझे बंदिशें भाती थीं पर मैं उन दीवारों का शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होंने मुझे उस वक़्त में सुना जब मेरे क़रीब किसी के कान नहीं थे, उन्होंने मुझे उस वक़्त देखा जब मैं अकेले घुटनों में सिर देकर रोता रहा लेकिन वे नि:शब्द सी मेरे कन्धों पर हाथ रखे मुझे एहसास कराती रही कि वे मेरे साथ हैं चाहे फिर कुछ भी हो और एक दिन मैंने अपनी आज़ादी चुनी उनकी कीमत पर. शायद यही इंसान के ख़्वाबों की नियति होती है कि जिस अँधेरे ने उसे सब कुछ सिखाया होता है वह उसी की कीमत पर अपनी रौशनी हासिल करता है.               मैं दुनिया से दूर जब अँधेरी रातों में तारों की रौशनी के साथ अपनी ख़ामोशी और अ...

विश्वास – जीवन जीने के लिए एक अपरिहार्य गुण

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जब भी आप पीछे मुड़कर देखते हैं और अपनी जीवन यात्रा के बारे में सोचते हैं, तो एक ऐसी चीज है जिसके बारे में आप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बेहद आभारी होंगे, वह है आपकी विश्वास करने की क्षमता। अविश्वास कारक के बारे में बहुत कुछ पढ़ने और चर्चा करते रहने के लिए उपलब्ध है कि हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ यह कैसे बढ़ रहा है, या जिस समाज में हम साथ रहने की योजना बना रहे हैं वहाँ कैसे उभर रहा है! लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि विश्वास कैसे अपनी भूमिका हमारे अस्तित्व में निभाता है। एक इंसान होने के नाते हम सभी "अजनबियों" पर भरोसा करने में पैदाईशी तौर पर सक्षम होते हैं; उस महिला से जो बच्चे को जन्म देती है, लेकिन बच्चे को उसके बारे में कुछ भी पता नहीं होता है, से लेकर अपनी उचित अंत्येष्टि की ख्वाहिश लिए किसी के हाथों में मरना। आप जानते हैं कि इस दुनिया में, जीवन के किसी एक या अन्य बिंदु पर, हम वैसे व्यक्ति की तरह कार्य करते हैं, जो हमारी जीवन यात्रा का हिस्सा होते हैं और दूसरों के साथ भी उसी तरह का व्यवहार करते हैं। एक ही व्यक्ति के साथ नहीं, बल्कि दूसरों के साथ भी। ब्रह्म...